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औरते

सडक के किनारे
बैठ जाती है
कुछ औरते
मील के पत्थरो की तरह
कुछ एक अंतर की दूरी पर
ये औरते —
जो पूरा दिन
अपना बदन ढकने मे
उलझी सी रहती है
सूरज की पहली किरन से पहले
धूँधली सी रोशनी मे
कुछ छोटे मोटे पौधो कि आड मे
और
कभी यूँ ही
बैठ जाती है
खडे पैर
झूके मुँह
शर्मसार…

❋ ❋ ❋

सोचता हूँ
कभी हम भी
इस शहर मे
नये थे
माँ कुछ उलझी सी रहती थी
पडोसन माँसी से अक्सर बातें किया करती थी
समझ न आता था
माँसी कहा करती थी
“इसमे शर्माना क्या ?
यह तो रोज का है
बस —
सिर मत उठाना ।”